शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

उदास है कमला— 1 (विक्रम नेगी)


उदास है कमला
क्योँकि नहीँ बची है माँ के हाथोँ मेँ-
एक भी चूढ़ी।

पिछले साल,
बाबू के दिल्ली जाने बाद,
कितने जतन से खरीदी थी उसने-
वो लाल-लाल
काँच की चूढ़ियाँ...
पूरे दस रुपये ख़र्च हुए थे उसके-
उन चूढ़ियोँ को ख़रीदने मेँ।

याद है उसे...
पिछली कक्षा की वो किताबेँ,
बिना ज़िल्द लगी कापियोँ का ढेर,
जिन्हेँ संभालकर रखा था उसने
माँ के लिए ।

सुनाई दे रही है उसे
आज भी वो आवाज़....
जिसे सुनकर भटकती रही थी वो
पागलोँ की तरह
दिनभर
सारे गाँव मेँ।

एक टूटा कनस्तर,
कुछ शीशे की बोतलेँ,
एक जंग लगी हुई चाभी का पुराना गुच्छा,
और प्लास्टिक की बोतलोँ के कुछएक ढक्कन,
जिन्हेँ बटोरकर ले आई थी वो-
सारा दिन भूखी-प्यासी रहकर।

आज भी छाई हुई है
उसके चेहरे पर
उस दिन की हताशा....
जब उसके घर पहुँचने से पहले ही-
दूसरे गाँव मेँ जा चुका था
"
चुड़ियाव"

कई दिन बीत जाने के बाद-
उसे फ़िर सुनाई दी थी-
वो आवाज़....
जब वह खेल रही थी
घर के आंगन मेँ अड्डू।

याद है उसे वो दिन....
कैसे उसने अपनी वो
सारी टूटी-फूटी चीज़ेँ-
बिखरा दी थी
घर के आंगन मेँ।

एक-एक चीज़ की कीमत
अपने मनमुताबिक-
लड़-झगड़कर
वसूल की थी उसने-
चुड़ियाव से...

पूरे दस रुपये लेकर-
दौड़ पड़ी थी वो माँ को बुलाने....
जो उस वक़्त लीप रही थी घर की देली।
खीँच ले आई थी वो माँ को-
मिट्टी सने हाथोँ सहित घर के आंगन मेँ।

चुड़ियाव ने एक-एक कर पहनाई थी-
माँ के हाथोँ मेँ
वो लाल-लाल चूढ़ियाँ।

माँ के मिट्टी सने हाथोँ मेँ
ऐसी चमक रहीँ थी वो चूढ़ियाँ,
जैसे खिल उठे होँ लाल बुराँश-
किसी सूखी टहनी पर।

कितनी खुश थी कमला उस दिन...
खूब नाची थी-
माँ के हाथोँ को पकड़कर,
जैसे खेल रही हो किसी सहेली के साथ-
"
सैनदेवी-कैँचीमाला"

मगर आज फिर उदास है कमला,
क्योँकि गाँव मेँ अब नहीँ आता "चुड़ियाव"
जबकि पहले से ज़्यादा
ढेर लगा है गाँव मेँ-
शराब की बोतलोँ का...
और आज भी सूनी हैँ-
माँ की कलाईयाँ....



विक्रम नेगी 
negiboond@gmail.com
9917791966

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